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चूचियाँ क्या मस्त थीं, था मटकता चूतड़ा

27.05.2015 15:26 EDT
चूचियाँ क्या मस्त थीं, था मटकता चूतड़ा
जब से देखा था उसे , लंड मेरा था खड़ा
जीन्स खिसकी जा रही थी, दोपहर की धूप में
गोरी-गोरी टांग थी, था लाल उसका मुखड़ा
आगे-आगे वो चली, तो पीछे-पीछे मैं चला
कैटवाक कर रही थी, जैसे प्रियंका चोपड़ा
देख मुझको पीछे मुड़के, भागने लगी थी वो
हाथ में था मैंने पकड़ा, फनफनाया सा लौंड़ा
जा दौड़ कर मैंने दबोची, फिर थी उसकी चूचियाँ
ले गया फिर खींच उसको, पास था इक झोपड़ा
मेरी पकड़ से छूटने को, वो कसमसाने थी लगी
फट गया इन कोशिशों में, उसका हर एक कपड़ा
चीखने चिल्लाने लगी थी, मुझको नंगा देख कर
मैंने झट से मुँह में पेला, खोल उसका जबड़ा
मूत उसकी गिर पड़ी थी, मेरा लौंड़ा देख कर
लंड तमतमाया था मेरा, मस्त मोटा तगड़ा
लंड चुसवा करके मुझको, चोदना था फिर उसे
चूत उसने थी सिकोड़ी, करके जाँघों को कड़ा
गोरी मांसल गांड उसकी, पतली-पतली टांग थी
कस के थप्पड़ मैंने उसके, चूतड़ों पर फिर जड़ा
बड़बड़ाने थी लगी वो, प्लीज़ मुझको छोड़ दो
खोल कर जांघें पर उसकी, चूत में लंड घुस पड़ा
चूत उसकी छटपटाई, और लंड को आया मज़ा
पूरा दिन चोदा उसे, और उसका बनाया भोसड़ा
चुद के मुझसे घर था जाना, फट गया था कपडा
मैंने उसके मुँह पे मारा, जेब में था रोकड़ा
© chootchodak@yahoo.com


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