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sabar ka phal

20.06.2011 04:48 EDT

सब्र का फ़ल-1

लेखिका : नेहा वर्मा

मेरी शादी गांव की रीति-रिवाज के हिसाब से कम उमर में ही हो गई थी। जिस घर में मैं ब्याही थी उसमें बस दो भाई ही थे, करोड़पति घर था, शहर में कई मकान थे। वे स्वयं भी चार्टेड अकाउंटेन्ट थे। छोटा भाई यानि देवर जी जिसे हम बॉबी कहते थे उसका काम अपनी जमीन जायदाद की देखरेख करना था। प्रवीण, मेरे पति एक सीधे साधे इन्सान थे, मृदु, और सरल स्वभाव के, सदा मुस्कराते रहने वाले व्यक्ति थे। इसके विपरीत बॉबी एक चुलबुला, शरारती युवक था, लड़कियों में दिलचस्पी रखने वाला लड़का था।

मेरी सहेली मेरी ही तरह गांव में पड़ोस में रहने वाली विधवा युवती गोमती थी जो मुझसे पांच साल बड़ी थी। मेरी राजदार थी वो, मैं उसे हमेशा साथ ही रखना चाहती थी, सो मैंने उसे अपने पास अपनी सहायता के लिये रख लिया था। उसकी उमर कोई बत्तीस वर्ष की थी। उसके पति एक दुर्घटना में चल बसे थे। वो मेरी मालिश किया करती थी, मुझे नहलाया करती थी। मुझसे नंगी व अश्लील बातें किया करती थी। मुझे इन सब बातों में बहुत मजा आता था। मेरे पति अधिकतर व्यवसायिक यात्रा पर रहा करते थे, उनकी अनुपस्थिति में एक गोमती ही थी जो उनकी कमी पूरी किया करती थी।

"ये घने काले काले गेसू, ये काली कजरारी आँखें, गोरा रंग, पत्तियों जैसे अधर, सखी री तू तो नाम की नहीं, वास्तव में मोहिनी है !"

"चल मुई ! बातें तो तुझसे करवा लो। खुद को देख, हरामजादी, जवानी से लदी पड़ी है ... किसी ने तेरी बजा दी तो वो तो निहाल ही हो जायेगा !"

"मोहिनी बाई ! चल अब उतार दे ये ब्लाऊज और ब्रा, खोल दे पट घूंघट के, और बाहर निकाल दे अपने बम के गोले, तेल मल दूँ तेरी जवानी को।"

मैंने अपना तंग ब्लाऊज धीरे से उतार दिया और ब्रा को भी हटा दिया। मेरी सुडौल तनी हुई दोनों चूचियाँ सामने उछल कर आ गई। गोमती ने बड़े प्यार से दोनों फ़ड़फ़ड़ाते कबूतरों को सहलाया और अपनी हथेलियों में ले लिया। मेरे मुख से आनन्द भरी आह निकल गई। मैंने बिस्तर पर अपने दोनों हाथ फ़ैला दिये और अपनी टांगें भी फ़ैला दी।

"गोमती, जरा हौले से, मस्ती से मालिश कर ना !"

गोमती हमेशा की तरह मेरी जांघों पर बैठ गई और तेल से भरे हाथ मेरी छातियों को गोलाई में मलने लगे। मेरे शरीर में एक अनजानी सी गुदगुदी भरने लगी। मेरे चूचक कठोर हो कर तन गये, थोड़े से फ़ूल गये। उसने मेरा ...


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