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17.07.2011 17:11 EDT
किसी को ये सुहाता है, किसी को वो सुहाता है |
ज़माने में सभी को, अपना - अपना रंग भाता है |
किसी को सुर्ख साड़ी में सजी दुल्हन लुभाती है |
किसी को दुस्साशन का कारनामा गुदगुदाता है ||
किसी को महफ़िलों का शोरगुल जँचता है आदतन |
किसी को तनहा रहने में मजा मिलता है आदतन |
किसी का शौक होता है, अपनों से जुड़ा जाये |
कोई बेगानों को ही ढूँढता रहता है आदतन ||
किसी का जोर चल जाये तो वो गांधीजी बनता है |
तो कोई इंदिरा बन के ज़माने में चमकता है |
कोई भाभा, कोई तुलसी, कोई बनता है तेंदुलकर |
कोई जयचंद बन, इतिहास के पन्नों में सजता है ||


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