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kamstr

30.06.2013 16:21 EDT
पवित्र और उज्ज्वल दर्शनीय है वह श्रृंगार रस से प्रेरित है अर्थात काम की कमनीयता है। कामसूत्र कहता है कि स्त्रियों को भी काम या जीवन की सभी कलाओं का ज्ञान होना चाहिए इसीलिए उन्होंने स्त्रियों के लिए मुख्यत: 64 कलाओं में कुछ शर्त के साथ पारंगत होने की शिक्षा दी है। स्त्री द्वारा 64 कलाओं का ज्ञान प्राप्त करने से ऐश्वर्य और सुख की वृद्धि होती है। पारंगत स्त्री को कामसूत्र में गणिका कहा गया है। गणिका अर्थात गुणवती या कलावती। जिन चौसठ कलाओं की चर्चा की गई है उनमें से ज्यादातर आज के युग अनुसार अप्रासंगिक मानी जा सकती हैं, लेकिन कुछ कलाएं आज भी प्रासंगिक हैं जैसे हर स्त्री गायन, वादन, नृत्य और चित्र में पारंगत हो सकती। अप्रासंगिक कलाएं- कल-पूर्जे बनाना स्त्रियों का काम नहीं। इंद्रजाल, बाजीकरण, हाथ की सफाई, घुड़सवारी करना, बढ़ईगिरी और तीतर, बटेर अथवा भेड़ को लड़ाने की कला तो अब बिल्कुल चलन से बाहर हो चुकी कलाएं हैं। खैर, जो भी हो कहने का आशय यह है कि कामसूत्र सिर्फ संभोग की ही शिक्षा नहीं देता यह जीवन के हर पहलुओं को छूता है। संभोग से समाधि : ऐसा माना जाता है कि जब संभोग की चरम अवस्था होती है उस वक्त विचार खो जाते हैं। इस अमनी दशा में जो आनंद की अनुभूति होती है वह समाधि के चरम आनंद की एक झलक मात्र है। संभोग के अंतिम क्षण में होशपूर्ण रहने से ही पता चलता है कि ध्यान क्या है। निर्विचार हो जाना ही समाधि की ओर रखा गया पहला कदम है। अत: संभोग की चर्चा से कतराना या उस पर लिखी गई श्रेष्ठ किताबों को न पढ़ना अर्थात एक विषय में अशिक्षित रह जाना है। कामशास्त्र या कामसूत्र इसलिए लिखा गया था कि लोगों में सेक्स के प्रति फैली भ्रांतियाँ दूर हों और वे इस शक्ति का अपने जीवन को सत्यम, शिवम और सुंदरम बनाने में अच्छे से उपयोग कर सकें


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