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कविता- बिजली कड़के, कड़कने दो

15.07.2011 06:43 EDT
बिजली कड़के कड़कने दो, बाजू फड़के फड़कने दो
राहों में कांटे ना बो, जो बोता है उसको धो दो
तूफान आ रहा है आने दो, कौवों को कड़कड़ाने दो
ज्वालामुखी तो फटा पड़ा है, लावा को बह जाने दो
पुलिस के डंडे संतों पर, पड़ते हैं पड़ जाने दो
नेता मंत्री रिश्वत खाएं, रिश्वत उनको खाने दो
काला धन विदेशों में, वहीं पर काला होने दो
मेहमान सरकारी अजमल-अफजल उनको ऐश उड़ाने दो
देश प्रेमी जय हिन्द बोलें, कोड़े उन्हें लग जाने दो
दुख में प्यारे तू ना रो, आंख बंद करके सो
दुख के बादल हट जाएंगे, नई चेतना भर जाएंगे
देखो पूरब में हलचल, नया सबेरा होने दो
भ्रष्टाचारी गद्दारों पर कुदरत को कहर बरपाने दो
मंत्री बाबू दहशत में, उन्हें अब घबराने दो
दरवाजे खड़े हैं यम के दूत, बांध इन्हें ले जाने दो

http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/8999020.cms


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