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Bhabhi ko choda

10.10.2014 01:18 EDT
मैं चन्दनकुमार हूँ, बिहार का रहने वाला हूँ, मैं शहर में कौलेज में पढ़ता हूँ, हॉस्टल में रहता हूँ और छुट्टी के दिनों में घर चला जाता हूँ, वैसे देखने में ठीक ठाक हूँ और शरीर से बलिष्ठ भी हूँ।
यह घटना इसी दिसम्बर की है। गांव में मेरे घर के पास ही मेरे दूर के रिश्ते के बड़े भाई साहब रहते हैं जो मुम्बई में काम करते हैं और हर तीन महीने में कुछ दिन के लिये घर आ जाते हैं परिवार से मिलने के लिये।
अगर वो आये होते हैं तो उनसे मिलने मैं कभी कभी चला जाता हूँ।
मेरी भाभी बहुत सुन्दर है और उसकी फिगर भी बहुत अच्छी है, 36-32-38, जब भी मैं भाई साहब से मिलकर लौटता, तो घर आकर भाभी के बारे में सोच सोच के मुट्ठ मारा करता था और कल्पना करता था कि भाभी मेरे साथ लिपटी हुई है, रात को स्वप्नों में बहुत बार मैं भाभी को चोद कर झड़ा भी।
इस बार जब मैं गाँव गया हुआ था तो भैया नहीं थे। फिर भी मैं इस बात से अनजान होने का नाटक करता हुआ उनके घर जा पहुँचा।
घर पर कोई नहीं था, उनका बेटा स्कूल गया हुआ था और उनकी बेटी अपने नाना नानी के यहाँ गई हुई थी।
इससे बढ़िया मौका फिर कहाँ मिलता तो मैंने सोचा कि भाभी से दिल की बात कह ही दूँगा, बुरा मानेगी तो पैर पकड़ कर माफी मांग लूँगा।
वैसे भी भैया तो तीन या चार महीने में एक बार आते हैं बेचारी पीछे से चुदाई की प्यासी ही रहती होगी। सम्भव है कि बुरा ना माने और तैयार ही हो जाये!
भैया के यहाँ पहुँचा तो भाभी घर के सामने सब्ज़ी गार्डन में चारपाई डाल के धूप सेक रही थी। मैं भी वहीं जाकर चारपाई के पास रखी हुई बेंच पर बैठ गया।
भाभी बोली- लल्ला, तुम आराम से बैठो, मैं तुम्हारे लिये चाय लेकर आती हूँ।
भाभी घर के भीतर चली गई और थोड़ी देर में चाय का एक ग्लास और खाने को लड्डू और मठरी एक प्लेट में ले आई।
चाय पीते पीते मैं भाभी को ध्यान से निहारा, मोटे मोटे गोल गोल मस्त चूचे भाभी का ब्लाउज़ फाड़ के बाहर टपकने को हो रहे थे।
नहाई धोई भाभी बला की खूबसूरत लग रही थी।
मेरा लौड़ा उत्तेजना में अकड़ चुका था और मेरी लुंगी को तम्बू की तरह उठा रहा था।
बातों बातों में मैंने कहा- भाभी, तुम्हारे बाग़ के बैंगन इतने लम्बे हो रहे हैं इनकी सब्ज़ी क्यों नहीं बना देती?
भाभी बोली- अरे लल्ला, हो तो रहे हैं बैगन लम्बे, लेकिन एक ही सब्ज़ी कितनी बार खाऊँ?
मैंने कहा- भाभी, चलो आप मत खाओ, मुझे ही दे दो, मैं अम्मा को देकर बनवा कर खा ...
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