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'ख़्वाहिश'

बनारस के घाट से एक कहानी उठाई है.. गंगा के पानी की तरह है। अंजुरी में भरकर पी जाइए फिर!!
:
रोज की तरह घाट पर लोगों का ताँता लगा था। शाम का वक़्त और पूरा आसमान अपने लाल रंग को गंगा में घोल देने को आतुर जान पड़ता था। सूरज धीरे-धीरे दूसरे किनारे की तरफ डूबता जा रहा था या यूँ कहो दिन भर तपने के बाद गंगा के पानी में अपने कलेजे को ठंडक देने जा रहा था। यहाँ कोई और भी था जो न जाने कब से तप रहा है। वो भी कभी-कभार अपने कलेजे में गंगा के छींटे मारने घाट पर आ बैठता था।

ऐसा ही तो एक शाम थी जब उसे देखा था। हाँ, यहीं इसी घाट पर। पीले रंग की चुन्नी से अपने सिर को ढँके, घुटने तक गंगा जी में खड़े हो न जाने क्या बुदबुदाती थी। अंजुरी में पानी ले गंगा जी को ही लौट दिया उनका जल, पर कुछ माँगा जरूर होगा। खैर! सीढ़ी चढ़ते हुए उसका पैर फिसला और सीधे गंगा जी में डुबकी। मैंने भी आव देखा न ताव, लगा दी छलांग किनारे पर और बाँहे पकड़ कर उसे सहारा दिया। ओह! इस दफ़ा मैं डूब गया। गहरी काली आँखे और पलकों से टपकता पानी। मैं बह जाऊँ, उससे पहले ही उसने धन्यवाद कह संभल कर सीढ़ी पर पैर रखा और ऊपर की ओर बढ़ गयी।

मैं उस सारी रात सोया नहीं। गंगा की ध्वनि मेरे ह्रदय में आवेग सा उठाती रही। उसके बाद उसी घाट पर कई शाम उससे आमना-सामना हुआ। एक-दूसरे को मुस्कुराहटों का अभिवादन मिलता और बस अपने-अपने रस्ते। न जाने क्यों मेरा मन गंगा के उस घाट पे ही छूटा रहता? गेरुए-स्लेटी पत्थर की सीढ़ियों से अनायास ही अपनत्व हो चला था। रोजाना घाट पे जाकर उसका इन्तेजार करना, उसके आ जाने पर संजीदगी से बैठना। क्यों कर रहा था ऐसा? वो भी क्यों रोज घाट पर चली आती है? इक लहर उससे उठकर मुझ तक जरूर आती है, तो फिर मुझसे उठकर उस तक भी जाती होगी। उसके सानिध्य में शाम को ढ़लते देखना रोज का शगल था। वो गंगा की तरह मेरे किरदार के सब रंग खुद में घोलती जा रही थी और मैं आसमां की तरह खुद-ब-खुद घुलता जाता था। घाट के शोर-शराबे के बीच दो खामोश लोग मुस्कुराहटों में ही बतियाते रह गए। अब हमारे बीच सीढ़ियों की दूरी भी कम हो चली थीं। .ऐसा भी होता कि कभी-कभी उसकी चुन्नी के सिरे को घाट की हवाएँ मेरे चेहरे तक ले आती। पर फिर भी गंगा के दोनों किनारों-सी दूरियाँ हमारे बीच थी और बस इन किनारों की तरह घाट का एक तय सफ़र था। इनके बीच था कुछ, तो बस आसमां के रंग समेटे हुए गहरे पानी जैसी भावनाएं.. जो छलछलाती, अंजुरी में सिमटती, प्रार्थनाएं सुनती और बेसाख्ता बहे जाती ...
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