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जरूर पढेँ: ग्वार पर किसका शाप!



September 18, 2012

ग्वार पर अब किसका शाप!

एक समय था जब ग्वार इतना सस्ता हुआ करता था कि राजस्थान में किसानइसका उपयोग मवेशियों के चारे के तौर पर करते थे। फिर शेल गैस उद्योग की वजह से इसकी मांग अचानक आसमान छूने लगी। 2008 से इस साल तक इसका निर्यात अत्यधिक बढ़ा हुआ है।

राजस्थान में जोधपुर के मशहूर मेहरानगढ़ किले के बारे में एक पौराणिक कथा प्रचलित है। ऐसा कहा जाता है कि जब मारवाड़ के शासक राव जोधा 1459 में इसकिले को बनवा रहे थे तो वहां से विस्थापित हो गए एक साधु ने क्रोध में आकर यह श्राप दिया कि यह साम्राज्य सूखे से ग्रस्त रहेगा। सदियों बाद जब वैश्विक तेल एवं गैस उद्योग को यहां के किसानों द्वारा उगाए जाने वाले ग्वार की जरूरत पड़ी तो लगा मानो इस साम्राज्य को श्रापसे मुक्ति मिल गई। ग्वार की खरीद के लिए विदेशों से बड़ी संख्या में खरीदार जोधपुर आने लगे जिससे इसकी कीमतें कई गुना बढ़ गईं। जुलाई 2011 में जहां इसकी कीमत प्रति किलो 134 रुपये थी वहीं मार्च 2012 में यह बढ़कर 1100 रुपये तक पहुंच गई। साथ ही इसी दौरान प्रसंस्करण मिलों की संख्या भी बढ़कर तकरीबन दोगुनी हो गई।
फिर भी, जोधपुर के आसपास के किसान और प्रसंस्करण मिलें अनिश्चितता के दौर से गुजर रही हैं। जोधपुर से 70 किलोमीटर की दूरी पर बाड़ा घुर्द नाम का एक गांव है जहां दोपहर की कड़कड़ातीधूप में पवनचक्कियां घूम रही हैं। तीन बेटों के बूढ़े पिता निंबाराम और इस गांव के दूसरे किसानों को पता है कि उनका कितना कुछ दांव पर लगा है। अपनी पिछली फसल बेचकर उन्होंने प्रति किलो 300 रुपये यानी कि पिछले साल से 10 गुना महंगी दर पर बीज खरीदे। और इस साल रकबा 1,00,000-1,30,000 हेक्टेयर से बढ़कर 2,00,000 हेक्टेयर तकपहुंच गया। इस बार बारिश ने भी साथ दिया। अगले एक महीने में फसल पूरी तरह तैयार हो चुकी होगी और इस बार रिकॉर्ड उत्पादन कीसंभावना है। अगर मांग अत्यधिक नहीं बढ़ती है तो सरकार द्वारा नियंत्रित समर्थन मूल्य के अभाव में हो सकता है कि निंबाराम जैसे किसानों को अपनी फसल के लिए कम भुगतान मिले।

निंबाराम जैसे किसानों के चेहरों पर चिंता की रेखाएं साफ देखी जा सकती हैं। शेल गैस उद्योग ग्वार का सबसे बड़ा उपभोक्ताबन कर उभरा है। भूमिगत हाइड्रोकार्बन को निकालने के लिए हाइड्रॉलिक फ्रैक्चरिंग के तहतयह उद्योग एक गम का इस्तेमाल करता है जो प्रसंस्कृत ...
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