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आजादी के बाद यहाँ मुस्लिम रहने देना महान भूल

ा। उत्तर भारत में जाटों एवं सिखों के प्रबल विरोध के बावजूद अंग्रेज साम-दाम, दण्ड-भेद की नीति से १८५७ तक पूरे भारत के शासक हो गए। इस काल खं डमें हिन्दू अपने शत्रुओं-अंग्रेजों और सुलतानोंके विरुद्ध सफल न हो सके। परन्तु मुसलमानों ने अपने इस्लामी भारत के सपने नहीं छोड़े।
५. स्वतंत्रता आन्दोलन काल (१८५७-१९४७)- भारत का अंग्रेजों के विरुद्ध पहला स्वतंत्रता संग्राम १८५७ में प्रारम्भ हुआ। यह आन्दोलन जन मानस का था, किसी तेजस्वी दूरदर्शी नेता के मार्ग दर्शन में योजनाबद्ध नहीं था। अतः कानपुर (बिठूर) के नाना साहेब पेशवा के बाद यह आन्दोलन प्रभावहीन हो गया। मुसलमानों ने खोई सत्ता पाने के अनेक प्रयास किए। मगर अंग्रेजों ने इन सबको कुचल दिया। इस काल में महर्षि दयानन्द सरस्वती, स्वामी विवेकानन्द एवं योगीश्री अरविन्द ने राष्ट्र चेतना जागृत की। उधर अंग्रेजों ने हिन्दू और मुसलमानों को ‘बाँटो और राज करो’ की नीति अपनाई तथा मुसलमानों का परोक्ष रूप में समर्थन किया। साथ ही हिन्दुओं का विरोध दबाने के लिए अंग्रेज ह्यूम ने १८८५ में कांग्रेस की स्थापना की जो ३० साल तक अप्रभावी रही। हालांकि बाल गंगाधर तिलक ने इसे आक्रामक बनाने का प्रयास किया।
मुसलमानों ने १९०६ में मुस्लिम लीग की स्थापना की जो अंग्रेजों के संरक्षण के कारणसैदव कांग्रेस पर हावी रही। १९२० के बाद कांग्रेस पर गाँधी-नेहरू का वर्चस्व हो जानेके कारण यह मुस्लिम लीग के कट्‌टरपन के आगे नतमस्तक हो गई।
कांग्रेस ने मुस्लिम लीग के मार्च १९४० के द्वि राष्ट्र सिद्धान्त के आधार पर भारत विभाजन तो माना परन्तु डॉ. अम्बेडकर एवं श्यामाप्रसाद मुखर्जी और पाकिस्तानी नेताओं के हिन्दू-मुस्लिम आबादी की अदला-बदली के तर्कसंगत सिद्धान्त को नहीं माना। इसमें गाँधी-नेहरु कांग्रेस और भारतीय मुसलमानों दोनों के ही अपने-अपने राजनैतिक स्वार्थ थे। नेहरू कांग्रेस मुस्लिम वोटों से लम्बे समय तक राज करना चाहते थे; और मुसलमान यहाँ बसे रहकर तेजी से आबादी बढ़ाकर शेष भारत को भी इस्लामी ...


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