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सिंध का युद्ध

सिंध का समुद्री मार्ग पूरे विश्व के साथ व्यापार करने के लिए खुला हुआ था। सिंध के व्यापारी उस काल में भी समुद्र मार्ग से व्यापार करने दूर देशों तक जाया करते थे और इराक-ईरान से आने वाले जहाज सिंध के देवल बन्दर होते हुए अन्य देशों की तरफ जाते थे। ईरानी लोगों ने सिंध की खुशहाली का अनुमान व्यापारियों की स्थिति और आने वाले मालअस्बाब से लगा लिया था। हालांकि जब कभी वे व्यापारियों से उनके देश के बारे में जानकारी लेते तो उन्हें यहीं जवाब मिलता कि पानी बहुत खारा है, जमीन पथरीली है, फल अच्छे नहीं होते ओर आदमी विश्वास योग्य नहीं है। इस कारण उनकी इच्छा देश पर आक्रमण करने की नहीं होती,किन्तु मन ही मन वे सिंध से ईष्र्या अवश्य करते थे।
महाराजा दाहिर अपना शासन राजधानी अलोर से चलाते थे और देवल बन्दरगााह पर प्रशासन की दृष्टि से अलग सूबेदार नियुक्त किया हुआ था। एक बार एक अरबी जहाज देवल बन्दरगाह पर विश्राम के लिए आकर रुका। जहाज में सवार व्यापारियों के सुरक्षा कर्मियों ने देवल के शहर पर बिना कारण हमला कर दिया और शहर से कुछ बच्चों ओर औरतों को जहाज में कैद कर लिया। जब इसका समाचार सूबेदार को मिला तो उसने अपने रक्षकों सहित जहाज पर आक्रमण कर अपहृत औरतों ओर बच्चों को बंधनमुक्त कराया। अरब जान बचा कर अपना जहाज लेकर भाग छूटे।
उन दिनों ईरान में धर्मगुरू खलीफा का शासन था। हजाज उनका मंत्री था। खलीफा के पूर्वजों ने सिंध फतह करने के मंसूबे बनाए थे, लेकिन अब तक उन्हें कोईसफलता नहीं मिली थी। अरब व्यपारी ने खलीफा के सामने उपस्थित होकर सिंध में हुई घटना को लूटपाट की घटना बताकर सहानुभूति प्राप्त करनी चाही। खलीफा स्वयं सिंध पर आक्रमण करने का बहाना ढूंढ़ रहा था। उसे ऐसे ही अवसर की तलाश थी। खलीफा ने हजाज को सिंध पर आक्रमण काआदेश दिया। हजाज धर्म गुरू के आदेश की पालना करने को मजबूर था। उसे अब्दुल्लानामक व्यक्ति के नेतृत्व में अरबी सैनिकों का दल सिंध विजय करने के लिए रवाना किया।
जब देवल के सूबेदार ने अरब जहाज पर सवारव्यापारियों के कारनामे का समाचार महाराजा दाहिर को भेजा तो वे तुरन्त समझ गए कि इसी बहाने अरब सेना सिंध पर आक्रमण अवश्य करेगी। उन्होंने अपनी सेना को तैयार रहने का आदेश ...


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